साधना

जब चिथड़ो मे लिपटे कलाकार ,
मोटी मोटी रोटियों निगलते हैं,
तब एक प्रश्न चिन्ह उभर आता है ,
इन ईंट सी रोटियों मे क्या इतनी ऊर्जा है ?
निरंतर अगड़ित ईटों को ढोते हुए वे कलांत नहीं होते ,
हम मेवे खाने वाले  मे इतने  अच्छम है की एक ईंट भी उठा लें ,
तब एक आकाशवाणी मन मे होती है ,
तुम तन के केंद्रित्करण हो ,
वे मन के केंद्रित्करण हैं ,
तुम भुक्त भोगी  हो ,
वो मुक्त भोगी हैं ,
तुम जीवन की  सम्पूर्ण शक्ति को तन मे समोते हो ,
वे जीवन की सम्पूर्ण शक्ति को मन मे समोते  हैं ,
तुम जीवन के समस्त माध्र्य को रो कर पीते हो ,
वे जीवन की समस्त कड़वाहट को प्रेम से पीते हैं ,
तुम साधन हो वो केवल साधक हैं I
स्वर्ण कौर

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"முகமறியா நண்பர்களின் கருத்துக்களே எனக்கு படிகற்கள்"